*लाल श्याम शाह की पुण्यतिथि का सफलतापूर्वक हुआ मोहला बस स्टैंड में हुआ आयोजन*

*लाल श्याम शाह की पुण्यतिथि का सफलतापूर्वक हुआ मोहला बस स्टैंड में हुआ आयोजन*

मोहला

पानाबरस राज के जमींदार और आदिवासी समाज की आवाज रहे जननायक लाल श्याम शाह महाराज (बड़े महराज) की पुण्यतिथि 10 मार्च पर जिला मुख्यालय मोहला में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

महाराज जननायक, विधायक, सांसद और आदिवासी प्रमुख नेता रहे, कार्यक्रम में हजारों की संख्या में सर्व समाज के लोग, विशेष रूप से आदिवासी समाज, ब्राह्मण समाज, मुस्लिम जमात के प्रतिनिधि शामिल हुए और उनके विचारों व संघर्षों को याद किया।

कार्यक्रम का आयोजन उस स्थान पर किया गया जहां उनके द्वारा दान की गई जमीन पर वर्तमान में बस स्टैंड संचालित हो रहा है। कार्यक्रम की शुरुआत लाल श्याम शाह महाराज की प्रतिमा पर पूजा-अर्चना और पुष्पांजलि अर्पित कर की गई।

इस अवसर पर उनके वंशज लाल लक्ष्मेंद्र शाह, जिला भाजपा अध्यक्ष दिलीप वर्मा, सर्व आदिवासी समाज के प्रवक्ता रमेश हिडामे, सर्व आदिवासी समाज अध्यक्ष संजीत ठाकुर, ब्राह्मण समाज अध्यक्ष धनंजय पांडे, मुस्लिम जमात अध्यक्ष मिर्जा नूर बेग, जिला पंचायत सदस्य लखन कलामे, नरसिंह भंडारी, जनपद सदस्य पवन तुलावी, मोहला सरपंच गजेंद्र पूरामे, खोरबाहरा राम यादव, दिलीप सिंगने, मुहम्मद खान, सुखदास मंडावी सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, समाजसेवी और क्षेत्रवासी उपस्थित रहे।

आदिवासी अधिकारों के प्रखर जननायक थे लाल श्याम शाह

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि लाल श्याम शाह केवल एक नाम नहीं बल्कि एक विचारधारा हैं। उन्होंने नेहरू और इंदिरा गांधी के समय में मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी क्षेत्र के आदिवासियों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। उनके आह्वान पर हजारों लोग बैलगाड़ियों के साथ रायपुर तक कूच करते थे और आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए आवाज उठाते थे।

चिपको आंदोलन की शुरुआत करने वालों में थे अग्रणी

वक्ताओं ने बताया कि वर्ष 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय सागौन प्लांटेशन योजना के तहत बड़े पैमाने पर उजड़े जंगलों में सागौन रोपनी व कटाई की योजना लाई गई थी। इसके विरोध में लाल श्याम शाह महाराज स्वयं आंदोलन में उतरे और चिपको आंदोलन की शुरुआत की। उनका मानना था कि ऐसे पेड़ जिन पर पक्षी घोंसला न बना सकें और जिनके नीचे वन औषधियां न उग सकें, वे जंगलों के लिए उपयोगी नहीं हैं। आंदोलन के कारण उन्हें गिरफ्तार कर काला पानी की जेल भेज दिया गया, लेकिन उनके संघर्ष के कारण जंगल और आदिवासी जीवन से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे।

मिशनरी स्कूलों के विरोध में चलाया अभियान

लाल श्याम शाह महाराज ने आदिवासी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा के लिए मिशनरी स्कूलों के विस्तार का भी विरोध किया। उनका मानना था कि इससे आदिम संस्कृति और परंपराओं पर खतरा पैदा हो सकता है। इस मुद्दे को लेकर उन्होंने मोहला-मानपुर ही नहीं बल्कि चंद्रपुर, बालाघाट, नागपुर, उड़ीसा और गोंदिया तक व्यापक अभियान चलाया।

इसी परिपेक्ष में उनके पोते लाल लक्ष्मेंद्र शाह भी आदिम संस्कृति में प्रमुख स्थान शीतला माता की जमीन का संरक्षण और राजस्व भू अभिलेखों में चिन्हांकित करने की बीड़ा उठाया है। और अवैध धर्मांतरण जैसे गंभीर मुद्दे पर धरातल में काम कर रहे है।

आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के लिए किया जीवन समर्पित

वक्ताओं ने कहा कि सात-चौदह जैसी आदिवासी परंपराओं के संरक्षण के लिए लाल श्याम शाह ने जीवन भर संघर्ष किया। उन्होंने बाहरी धार्मिक और सांस्कृतिक प्रभावों से क्षेत्र की परंपराओं को बचाने के लिए निरंतर काम किया। कहा जाता है कि जिन क्षेत्रों में उन्होंने काम किया, वहां आज भी आदिवासी संस्कृति मजबूत रूप से जीवित है।

अवैध धर्मांतरण के खिलाफ भी उठाई आवाज

कार्यक्रम में लाल लक्ष्मेंद्र शाह ने अपने दादा को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अवैध धर्मांतरण के खिलाफ भी संघर्ष किया और आदिवासी संस्कृति को बचाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान उन्होंने राजनांदगांव पुलिस अधीक्षक अंकिता वर्मा की भी सराहना की, जिन्होंने अवैध चर्च और विदेशी फंडिंग के मामलों का खुलासा कर कार्रवाई की है। उन्होंने मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी पुलिस से भी इस दिशा में सहयोग की अपेक्षा जताई।

एक दिन के सांसद रहे 

सांसद बनने के बाद वे संसद पहुंचे। वहां मांग उठाई कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र को अलग राज्य बना दिया जाए। इस मांग पर कोई सुनवाई नहीं हुई। इस पर उन्होंने पद का मोह नहीं किया और इस्तीफा देकर गांव लौट आए। इस्तीफे के साथ एक पत्र भी लिखा, जिसमें उन्होंने वजह बताते हुए कहा था- ‘आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र को गोंडवाना राज्य का दर्जा दिया जाए। जब नए राज्य सांस्कृतिक, भौगोलिक व ऐतिहासिक आधार पर बनाए जा रहे हैं तो हमारी गोंडवाना प्रांत की मांग की उपेक्षा क्या घोर अन्याय नहीं है? 10 मार्च 1988 को श्याम शाह की मृत्यु हो गई। अलग राज्य की मांग पूरी तो हुई, लेकिन उनकी मृत्यु के 12 साल बाद लाल श्याम शाह ने अपने पूरे जीवन में पद और सत्ता से अधिक समाज के हक और सम्मान को प्राथमिकता दी। वे मध्य भारत के आदिवासी समाज की आवाज और विवेक माने जाते थे। वर्ष 1988 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार और संघर्ष आज भी समाज को प्रेरित करते हैं।

क्षेत्र के विकास के लिए दी कई जमीनें

कार्यक्रम में बताया गया कि लाल श्याम शाह और उनके परिवार ने क्षेत्र के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण जमीनें दान में दीं। इनमें मोहला का बस स्टैंड, कॉलेज, शीतला मंदिर, पशु चिकित्सालय सहित अन्य सार्वजनिक संस्थानों की जमीन शामिल है।

सामुदायिक वन अधिकार को लेकर भी उठी मांग

कार्यक्रम के दौरान सामुदायिक वन संसाधन अधिकार को लेकर भी मुद्दा उठाया गया। बताया गया कि जनवरी 2024 में डीएलसी के अनुमोदन के बाद 22 गांवों को पट्टा वितरण किया गया था, लेकिन कुछ ही घंटों बाद 18 गांवों से पट्टे वापस ले लिए गए। दो वर्ष बीत जाने के बाद भी इस मामले में कोई ठोस पहल नहीं हो पाई है।

इस संबंध में राज्यपाल, मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपते हुए चेतावनी दी गई कि यदि जल्द पट्टे वापस नहीं दिए गए तो क्षेत्रवासी सड़क पर उतरकर व्यापक आंदोलन करेंगे।

कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों ने लाल श्याम शाह महाराज के आदर्शों और विचारधारा को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर 10 मार्च को मोहला में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उनके जीवन, संघर्ष और विचारों को याद करते हुए नई पीढ़ी तक उनकी विरासत पहुंचाने का प्रयास किया गया। आयोजकों ने क्षेत्र के सभी सामाजिक संगठनों और नागरिकों से कार्यक्रम में शामिल होकर जननायक राजे लाल श्याम शाह को श्रद्धांजलि अर्पित करने की अपील की थी।