*लाल श्याम शाह महाराज की पुण्यतिथि पर 10मार्च को बस स्टैंड मोहला में कार्यक्रम का किया जाएगा गया आयोजन

*लाल श्याम शाह महाराज की पुण्यतिथि पर 10मार्च को बस स्टैंड मोहला में कार्यक्रम का किया जाएगा गया आयोजन

मोहला

मध्य भारत के आदिवासी समाज की हक-अधिकार की आवाज बुलंद करने वाले प्रखर जननायक लाल श्याम शाह की पुण्यतिथि 10 मार्च 2026, मंगलवार को मोहला में श्रद्धापूर्वक मनाई जाएगी। इस अवसर पर लाल श्याम शाह बस स्टैंड, मोहला में सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम में 14 गढ़ राज क्षेत्र सहित पूरे वनांचल से सर्व समाज के लोग, बुद्धिजीवी, युवा, महिलाएं और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।

इतिहासकारों के अनुसार वर्ष 1919 में जन्मे राजे लाल श्याम शाह आदिवासी समाज के ऐसे नेता थे, जिन्होंने संपन्न पृष्ठभूमि होने के बावजूद समाज सेवा और जनअधिकारों की लड़ाई को अपना जीवन लक्ष्य बनाया। उन्होंने आदिवासी समाज के जल-जंगल-जमीन के अधिकार और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष किया। इसी उद्देश्य से उन्होंने आदिवासी महासभा के माध्यम से समाज को संगठित करने का कार्य भी किया।

चुनाव जीता, फिर भी दे दिया इस्तीफा

आजादी के बाद लाल श्याम शाह ने लोकतांत्रिक राजनीति में भी भागीदारी निभाई। पहले चुनाव में कम मतों से हारने के बाद अदालत के आदेश पर दोबारा चुनाव हुआ, जिसमें वे विजयी हुए। लेकिन बाद में आदिवासी समाज के शोषण और सरकारी नीतियों से आहत होकर उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। अपने इस्तीफे में उन्होंने आदिवासी हितों की अनदेखी और ठेकेदारी व्यवस्था को जिम्मेदार बताया था।

पंडित नेहरू से की थी मुलाकात

अक्टूबर 1960 में रायपुर में पंडित जवाहरलाल नेहरू से उनकी मुलाकात भी काफी चर्चित रही। उस समय शाह ने हजारों आदिवासियों के साथ पदयात्रा कर उनकी समस्याओं को सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंचाने का प्रयास किया था। उनका उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों के विकास, आर्थिक सुरक्षा और अधिकारों के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना था।

लोकसभा सदस्य भी रहे

वर्ष 1962 में वे चांदा लोकसभा क्षेत्र (वर्तमान चंद्रपुर) से सांसद चुने गए।

सांसद बनने के बाद पहली बार संसद पहुंचे। आदिवासियों के हक की मांग उठाई। मांग नहीं मानी गई तो पद भी वहीं छोड़ आए। शाह का कार्यकाल यूं तो 10 दिन का रहा, लेकिन संसद में महज एक दिन के सांसद रहे। उनकी बेबाकी और संघर्षों की याद ताजा रखने के लिए ही ग्रामीणों ने ये प्रतिमाएं लगवाई हैं। मोहला क्षेत्र के पानाबरस गांव में जमींदार के घर 1 मई 1919 को जन्मे लालश्याम शाह चर्चित आदिवासी नेता के रूप में उभरे। वे आदिवासी और कमजोर वर्ग के लोगों के लिए खुलकर संघर्ष करते थे।

सांसद बनने के बाद वे संसद पहुंचे। वहां मांग उठाई कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र को अलग राज्य बना दिया जाए। इस मांग पर कोई सुनवाई नहीं हुई। इस पर उन्होंने पद का मोह नहीं किया और इस्तीफा देकर गांव लौट आए। इस्तीफे के साथ एक पत्र भी लिखा, जिसमें उन्होंने वजह बताते हुए कहा था- ‘आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र को गोंडवाना राज्य का दर्जा दिया जाए। जब नए राज्य सांस्कृतिक, भौगोलिक व ऐतिहासिक आधार पर बनाए जा रहे हैं तो हमारी गोंडवाना प्रांत की मांग की उपेक्षा क्या घोर अन्याय नहीं है? 10 मार्च 1988 को श्याम शाह की मृत्यु हो गई। अलग राज्य की मांग पूरी तो हुई, लेकिन उनकी मृत्यु के 12 साल बाद। 

आपातकाल में भी नहीं झुकी आवाज

1975 में लागू आपातकाल के दौरान भी लाल श्याम शाह की आवाज को दबाया नहीं जा सका। उन्हें गिरफ्तार कर लगभग एक वर्ष तक जेल में रखा गया, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। बाद के वर्षों में वे “जंगल बचाओ, मानव बचाओ” आंदोलन से भी जुड़े और आदिवासी क्षेत्रों में बड़े बांधों व परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन के खिलाफ संघर्ष करते रहे।

समाज के लिए समर्पित रहा जीवन

लाल श्याम शाह ने अपने पूरे जीवन में पद और सत्ता से अधिक समाज के हक और सम्मान को प्राथमिकता दी। वे मध्य भारत के आदिवासी समाज की आवाज और विवेक माने जाते थे। वर्ष 1988 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार और संघर्ष आज भी समाज को प्रेरित करते हैं।

उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर 10 मार्च को मोहला में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उनके जीवन, संघर्ष और विचारों को याद करते हुए नई पीढ़ी तक उनकी विरासत पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। आयोजकों ने क्षेत्र के सभी सामाजिक संगठनों और नागरिकों से कार्यक्रम में शामिल होकर जननायक राजे लाल श्याम शाह को श्रद्धांजलि अर्पित करने की अपील की है।